सोनपापड़ी और चाकलेट की प्रतिस्पर्धा में विदेशी बाजारों का तिलिस्म

सोनपापड़ी और चाकलेट की प्रतिस्पर्धा में विदेशी बाजारों का तिलिस्म

आपने सोनपापड़ी का नाम अवश्य सुना होगा। इसका उपहास सिर्फ कुछ विदेशी ब्रांड को ऊंचा उठाने के लिए हम लोगों के द्वारा किया जाता है। जो आपके लिए सहज ही उपलब्ध हो उसका मूल्य हम नही जान सकते या यूँ कहें कि जानने की कोशिश नही करते।

परसाई जी का व्यंग है कि "जो व्यक्ति आपको अंधेरे का डर दिखा रहा है, दरअसल वो आपको अपनी कम्पनी का टॉर्च बेचना चाहता है ।"

आपने महसूस किया होगा दीवाली के आसपास News में नकली मावा-खोया का प्रोपेगेंडा चरम पर रहता है कि मिठाईयाँ मत लीजिए । ये जहर है। एक मिशन के तहत चॉकलेट्स कम्पनियों ने सभी का माइंड वाश कर दिया है ।



इनके तिलिस्म को समझिए। आप अपने यहाँ की नामी और पुरानी दुकान से मिठाई लीजिए । अधिक लाभ के लिए मिलावट करके वो दुकानदार अपनी पीढ़ियाँ लगा कर बनाई साख से समझौता नहीं करेगा ।

महीनों पहले बनी, बासी हुईं, फ्रिज में पड़ी पत्थर हुई चॉकलेट्स को कभी-कभी खाया जा सकता है। पर ताज़ी, लज़ीज़ भारतीय मिठाइयों के आगे इनकी कोई औकात नहीं है।

जी हां। जिसे हरा न सको उसे यशहीन कर दो।

उसका उपहास करो।

उसकी छवि मलिन कर दो।

बस ऐसा ही कुछ हुआ है इस सुंदर मिठाई के संग में भी।

आपने इधर सोन पापड़ी जोक्स और मीम्स भारी संख्या में देखे होंगे। निर्दोष भाव से उन पर हँस भी दिए होंगे। पर अगली बार उस बाज़ार को समझिए जो मिठाई से लेकर दवाई तक और कपड़ों से लेकर संस्कृति तक में अपने नाखून गड़ाये बैठा है।

एक ऐसी मिठाई जिसे एक स्थानीय कारीगर न्यूनतम संसाधनों में बना बेच लेता हो। जिसमें सिंथेटिक मावे की मिलावट न हो। जो अपनी शानदार पैकेजिंग और लंबी शेल्फ लाइफ के चलते आवश्यकता से अधिक मात्रा में उपलब्ध होने पर बिना दूषित हुए किसी और को दी जा सके, खोये की मिठाई की तरह सड़कर कूड़ेदान में न जा गिरे। आश्चर्य, बिल्कुल एक सुंदर, भरोसेमंद मनुष्य की तरह जिस सहजता के लिए इसका सम्मान होना चाहिए, इसे हेय किया जा रहा है।


एक काम कीजिये डायबिटिक न हों तो घर में रखे सोनपापड़ी के डिब्बों में से एक को खोलिए। नायाब कारीगरी का नमूना गुदगुदी परतों वाला सोनपापड़ी का एक सुनहरा, सुगंधित टुकड़ा मुँह में रखिये। भीतर जाने से पहले होंठों पर ही न घुल जाये तो बनानेवाले का नाम बदल दीजियेगा। कई लोगों की पसंदीदा मिठाई यूँ ही नहीं है।



बात बाज़ार से शुरू हुई थी, सोनपापड़ी तो तिरस्कार का विषय हुई। अब लंबी शेल्फ लाइफ और बढ़िया पैकेजिंग का दूसरा किफ़ायती उपहार और क्या हो सकता है? चॉकलेट्स!!! और क्या? समझ रहे होंगे।

एक छोटे से उपहास के चलते, इधर के दो चार महीनों में ही कैडबरी का ही टर्न ओवर क्या से क्या हो सकता है मेरी कल्पना से बाहर की बात है। पिछले दो दशकों से वे बड़े- बड़े फ़िल्म स्टार्स को करोड़ों रुपये सिर्फ़ इस बात के दे रहे हैं कि हमारी जड़ बुद्धि में 'कुछ मीठा हो जाये' यानी चॉकलेट ठूँस सकें। और हम हैं कि अब भी मीठा यानी मिठाई ही सूँघते, ढूँढ़ते फिर रहे हैं। तो क्या करना चाहिए। मिठाई क्या यह तो प्रोटीन बार है, और चीनी तो हर मिठाई में है। और लोकप्रियता का आधार देखिये वो 35 रुपये में एक टुकड़ा देते हैं ये डिब्बाभर थमा देते हैं। सो, याद रखिये, मीठा यानी, गुलाबजामुन, रसगुल्ला, सोनपापड़ी और सूजी का हलवा। चॉकलेट यानी चॉकलेट।

ये पुरी कहानी सच है। लेकिन कुछ भूतिया टाइप के नायक भी सड़ी हुई चाकलेट के लिये प्रचार करते हैं कि "कुछ मीठा हो जाये।" मानो भारत भूमि पर मिठाइयों की विविधता में कमी है। मैं यह दावा कर सकता हूँ कि जितनी मिठाइयों की विविधता मात्र भारत में है उतना संपूर्ण विश्व को मिलाकर भी नहीं होगा। ऐसे धूर्तों की कपट पर घिन भी होती है इनसे।

एक सुनियोजित प्रयास करके, सोनपापड़ी को चॉकलेट की प्रतिस्पर्धा से बाहर करने के लिए इसका उपहास किया गया था। क्योंकि सोनपापड़ी हर उस कंफेक्शनरी परचूनी की दुकान पर बिकती थी, जहां चाकलेट का अपना अस्तित्व खतरे मे था। उस से ज्यादा सस्ती, किफायती और लोकप्रिय होने के कारण इसे यशहीन कर, चाकलेट को प्रोत्साहित किया गया है।

ऐसे देखा जाए तो चाकलेट को लोकप्रिय बनाने में साधारण जन की भूमिका भी कम नहीं है। मिठाइयों की चेकिंग कम से कम त्योहारों पर तो हो जाती है पर कभी भी न पढ़ा या सुना कि कभी चाकलेट का भी नमूना लिया गया और गुणवत्ता का चेक हुआ हो।


बेशक सोनपापड़ी एक अच्छी मिठाई है लेकिन समस्या ये है कि पर्व त्योहार के समय लगभग हर मिलने वाले से सस्ता और टिकाऊ होने के कारण इसी का डिब्बा लगभग प्रत्येक घर में आता है जिसकी वजह से शुरु होता है इसकी बंटाई का घूमना क्योंकि घर में सारी मिठाई खायी नहीं जा सकती है और ज्यादा दिन तक कोई इसको घर में भी नहीं रखना चाहता और फिर पैसे बचाने की चाहत के चलते ये एक घर से दूसरे घर दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे घर घूमता रहता है। शायद यही वजह है कि लोगों ने इसको एक व्यंग्य के तौर पर प्रस्तुत किया हो अन्यथा आपकी बात सत्य है कि विदेशी मार्केट को बढावा देने के बजाय हमें अपने उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
साभार

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